Gauri Ganpati 2025: ज्येष्ठा गौरी आवाहन पूजन महाराष्ट्र के साथ भारत में कई जगह मनाया जाता है। इनके कई नाम है गौरी गणपति, मंगला गौरी और ज्येष्ठा गौरी। ज्येष्ठा गौरी पूजन मुख्यतः महाराष्ट्र में मनाया जाता है। यह एक हिंदू त्यौहार गणेश चतुर्थी के दौरान महाराष्ट्र में तीन दिन के लिए मनाया जाता है। यह त्यौहार विवाहित और अविवाहित दोनों महिलाएं द्वारा किया जाता है। हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार माता सीता ने भगवान रामको पाने के लिए गौरी पूजन किया था। इस साल गौरी पूजन सोमवार 1 सितंबर 2025 को मनाया जाएगा। ज्येष्ठा गौरी गणपति की कौन है, महत्व , गौरी गणपति इतिहास गौरी पूजन तिथि और इसके बारे में इस eventtodays.com ब्लॉग आर्टिकल में हम जानेंगे।
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Gauri Ganpati 2025 |
गौरी आवाहन, पूजा और विसर्जन 2025
ज्येष्ठा गौरी का आगमन और गणेश चतुर्थी उत्सव महाराष्ट्र में बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। गणेश चतुर्थी उत्सव 10 दिन के लिए मनाया जाता है। और मंगला गौरी यानी कि गौरी गणपति का उत्सव तीन दिन के लिए मनाया जाता है।
1.गौरी पूजन तिथि 2025
ज्येष्ठा गौरी पूजन सोमवार को 1 सितंबर 2025 को मनाया जाएगा। गौरी पूजन एक महाराष्ट्रीयन तीन-दिवसीय त्यौहार है।
दोस्तों जब हम हमारे घर में गौरी पूजा करने की सोचते हैं,तो गौरी पूजा मुहूर्त जानना बहुत जरूरी होता हैं । तो आईए जानते हैं इसके बारे में।
ज्येष्ठा गौरी आवाहन (स्वागत): रविवार, 31 अगस्त 2025
पूजा मुहूर्त
गौरी गणपति की पुजा सुबह 5:59 बजे से लेकर शाम तक 6:43 बजे तक है।
ज्येष्ठा गौरी विसर्जन: मंगलवार 2 सितंबर 2025,
सुबह 9:50 बजे तक है।
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गौरी गणपती सेलिब्रेट कैसे करें?
गौरी गणपति का उत्सव महाराष्ट्र का एक महत्वपूर्ण पर्व है , जिसमें देवी ज्येष्ठा गौरी और भगवान गणेश की पूजा की जाती है। यह उत्सव महाराष्ट्र में गणेश चतुर्थी के दौरान मनाया जाता है। पहले दिन मंगला गौरी का हवन किया जाता है फिर दूसरे दिन उनकी पूजा की जाती है और तीसरे दिन देवी गौरी का विसर्जन किया जाता है।
ज्येष्ठा गौरी उत्सव में गौरी माता की मूर्ति घर लाई जाती है और इसकी विधिवत पूजा की जाती है और इन दोनों स्वादिष्ट भोजन बनाया जाता है और सुख समृद्धि के लिए प्रार्थना की जाती है।
1.गौरी का (आवाहन) आगमन पहिला दिन पुजा विधि
गौरी पूजा के लिए की दो मूर्तियों को घर लाया जाता है। ग्रामीण भागों में गांव की महिलाएं जिस घर में यह त्यौहार मनाया जा रहा है उस घर की महिला अन्य आसपास की महिलाओं को बुलाकर लाती है। देवी गौरी की मूर्तियों को गेहूं की बोरी में बिठाकर उन्हें हल्दी कुमकुम लगाया जाता है। यह हल्दी कुमकुम घर के बाहर सभी महिलाएं करती हैं। और घर में जिस जगह पर इन गौरी को बिठाना है उस जगह तक रंगोली डालती हैं। और उन मूर्तियों को घर में लाते समय जिस घर में यह गौरी का उत्सव है वह महिला बोलती है की महाराष्ट्र में मराठी भाषा में "लक्ष्मी आल्या कोणाच्या पावली आल्या" और बाकी की महिलाएं कहती है की गायीच्या पावली आल्या, शेताच्या, शेळ्या मेंढ्यांच्या
ऐसा कहा जाता है। और गौरी माता को उनके जगह पर बिठा जाता है हल्दी कुमकुम लगाकर।
ज्येष्ठा गौरी के मूर्तियों को साड़ी पहनाया जाता है। उन्हें गहने और कुछ अलंकारों से सजाया जाता है और उनके हाथों में कुछ रुपए रख दिए जाते हैं।
और माता गौरी के आगे कुछ फल, मिठाई गणपति को बिठाया जाता है। और उस जगह की अच्छे से लाइट से रोशनी की जाती है। गौरी को बिठाया जाता है। उस जगह को अच्छे से सजाया जाता है। यानी की देवी गौरी का श्रृंगार किया जाता है। देवी गौरी को सुंदर साड़ी ,आभूषण और अन्य श्रृंगार की वस्तुएं अर्पित की जाती है। देवी को फूल, नैवेद्य, (मिठाई)आदि अर्पित किया जाता है। दोस्तों इस प्रथा को गौरी का आह्वान करना कहा जाता है।
2.दुसरा दिन गौरी पूजा
दूसरे दिन देवी गौरी के लिए पूरन पोली का नैवेद्य दिया जाता है। दूसरे दिन ज्येष्ठा नक्षत्र पर सुबह गौरी जिन्हें महालक्ष्मी भी कहा जाता है पूजा की जाती है और आरती की जाती है। और नाश्ते में जलेबी, लड्डू,करंजी,चकली, शेव,पापड़ी, पूरन पोली (पुरणपोळी) भात, आमटी, ये महाराष्ट्रीयन पदार्थों को प्रसाद के रूप में बनाया जाता हैं। गांव की महिलाएं सात महिलाओं को सबसे पहले यह भोग लगा देती है। कुछ लोग देवी गौरी का दर्शन करने के लिए आते हैं।
3. तीसरा दिन गौरी विसर्जन
तीसरे दिन ज्येष्ठा गौरी उसे गौरी गणपति, मंगला गौरी, महालक्ष्मी भी कहा जाता है। उनका विसर्जन किया जाता है। यह विसर्जन मंगलवार 2 सितंबर 2025 को होगा। महाराष्ट्र में गांव की महिलाएं फिर से तीसरे दिन इकट्ठा होती है। और उन्हें जलेबी, लड्डू, चकली, केले, सेब, मीठे फल, मिठाई आदि खिलाई जाती है। जितना भी मिठाई
देवी गौरी के सामने रखी जाती है। वह सभी मिठाई थोड़ी थोड़ी करके वहां पर उपस्थित हुई सभी महिलाएं को खिलाया जाता है उसके बाद सुबह के समय धागे की गांठें है बांधी जाती है। हु इस थे धागे में तुलसी का पत्ता, हल्दी, कुमकुम, छुहारा, सूखे नारियल, दूर्वा, चिरचिटा , पान का पत्ता, सुपारी आदि की गांठे धागे में बांधी जाती है।
तीसरे दिन में गौरी यानी कि महालक्ष्मी के चेहरे पर एक प्रकार की उदासी दिखाई देती है। गौरी का पूजा की जाती है आरती की जाती है और उन्हें अगले वर्ष आने का निमंत्रण देकर विदा किया जाता है। कुछ जगह पर गौरी का विसर्जन किया जाता है। लेकिन कुछ जगहों पर सिर्फ मूर्तियां खराब होने के बाद ही उनका विसर्जन किया जाता है। और कुछ जगहों पर मूर्तियां सेफ रखे जाते हैं अगले साल के लिए उनका विसर्जन नहीं किया जाता है।
गौरी पूजन का महत्व
पौराणिक मान्यता के अनुसार कहा जाता है कि ज्येष्ठा गौरी के पूजन से घर में सुख समृद्धि आती है। और देवी गौरी परिवार की रक्षा करती है।
ऐसा माना जाता है कि गौरी माता अपने मायके यानी कि घर आती है इसलिए उनकी अच्छी से
पूजा की जाती है।
मान्यता है कि यह व्रत विवाहित महिलाएं अपने पतियों की लंबी उम्र और कल्याण के लिए करती है।
कुंवारी लड़कियां भी मनचाहा और योग्य जीवन साथी पानी के लिए गौरी पूजन करती है।
गौरी गणपति का उत्सव देवी गौरी के सम्मान में मनाई जाता है। हिंदुओं का संस्कृत और धार्मिक पर्व है। इस त्यौहार में परिवार और समुदाय की भागीदारी होती है।
गौरी पूजन व्रत कथा(मंगला गौरी व्रत कथा)
गौरी गणपति को मंगला गौरी के नाम से भी जाना जाता है। गौरी पूजन यानी की मंगला गौरी व्रत कथा एक पौराणिक कथा है। कुण्डिनपुर नाम के नगर में धर्मपाल नाम का एक व्यापारी रहता था। उसके पास धन संपत्ति सब कुछ था लेकिन उसे अपनी कोई संतान नहीं थी। अपनी खुद की संतान न होने के कारण वह हमेशा दुखी रहता था। बहुत तपस्या पूजा पाठ करने के बाद उन्हें एक पुत्र की प्राप्ति हुई, मगर ज्योतिषीयों ने बताया कि तुम्हारा पुत्र अल्पायु है और 16 वर्ष की आयु में सांप के काटने से उसकी मृत्यु हो जाएगी।
संयोग से उस अल्पायु पुत्र का विवाह एक ऐसी कन्या से हुआ जिसकी मां मंगला गौरी का व्रत करती थी।
मंगला गौरी का आशीर्वाद के कारण उस कन्या को सुखी और अखंड सौभाग्य का वरदान मिला था।
इस कारण व्यापारी के अल्पायु पुत्र की मृत्यु होने से टल गई। और उसे पुत्र को लंबी आयु प्राप्त हई।
इस कथा के अनुसार विवाहित महिलाएं अखंड सौभाग्य और सुख समृद्धि के लिए मंगला गौरी का व्रत करती है। यह पति की लंबी आयु के लिए व्रत किया जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार इस व्रत से वैवाहिक जीवन में धन सुख, समृद्धि और खुशहाली आती है।
ज्येष्ठा गौरी की कथा Jyeshtha Gauri Katha)
पौराणिक कथा के अनुसार ज्येष्ठा गौरी की कथा में समुद्र मंथन के दौरान लक्ष्मी और उनकी बड़ी बहन अलक्ष्मी का जन्म हुआ था।
ज्येष्ठा गौरी (अलक्ष्मी) और कनिष्ठा गौरी (महालक्ष्मी) के दो रूप है। जो महालक्ष्मी के रूप में घर आने पर साथ विराजमान होती है।
ज्येष्ठा गौरी (अलक्ष्मी) को धन की कमी, व्यय और नुकसान से जोड़ा जाता है। इसलिए अलक्ष्मी को घर में आने से रोकने और दूर करने के लिए पूजा करने का विधान है।
कनिष्ठा गौरी (महालक्ष्मी) को धन, समृद्धि और सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है।
गौरी पूजा में महिलाएं घर में लक्ष्मी और अलक्ष्मी के साथ उनके पुत्रों का भी आवाहन करती है, क्योंकि दोनों ही धन और समृद्धि के लिए महत्वपूर्ण है।
मान्यता है कि ज्येष्ठा गौरी के रूप में अलक्ष्मी की पूजा करने से घर से दरिद्रता और नुकसान को दूर किया जा जाता है।
कनिष्ठा गौरी के रूप में महालक्ष्मी का स्वागत करके घर में धन और समृद्धि लाई जाती है।
इस तरह से धन और व्यय, समृद्धि और कमी के बीच संतुलन बनाए रखने का एक महत्वपूर्ण पर्व है।
गौरी गणपति के पीछे की कहानी क्या है?
पौराणिक कथा के अनुसार गौरी को
मां पार्वती का दूसरा नाम भी माना जाता है।
महाराष्ट्र में कुछ जगहों में गौरी को गणेश की माता नहीं,बल्कि उनकी बहन माना जाता है जो उनसे मिलने आती है।
कुछ लोगों का कहना है कि भगवान गणेश की दो बहने हैं ज्येष्ठा और कनिष्ठा। इसलिए गौरी पूजा में गौरी की दो मूर्तियों के साथ पूजा की जाती है।
कुछ और परंपराओं में गौरी की तुलना देवी लक्ष्मी या पार्वती से की जाती है।
गौरी गणपति का किसी के घर में आगमन होना स्वास्थ्य, सुख और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।
हिंदू पौराणिक कथा के अनुसार देवी गौरी एक भक्त के घर जाती है ,जहां उन्हें भगवान गणेश मिलते हैं। जो गणेशोत्सव के दौरान उस भक्त के घर ठहरे हुए थे। लोगों का मानना है कि देवी गौरी उन लोगों के घरों में धन और समृद्धि लाती है जिनके यहां वे रूकती है। इस कारण से गणेश और गौरी मूर्तियों की पूजा की जाती है।
निष्कर्ष: (Conclusion)
गौरी गणपति(Gauri Ganpati 2025)का त्यौहार मुख्यतः महाराष्ट्र में मनाया जाता है। यह देवी गौरी की पूजा के लिए समर्पित है। इस त्यौहार को ज्येष्ठा गौरी पूजा और मंगला गौरी व्रत के नाम से भी जाना जाता है। गौरी पूजन गणपति उत्सव के तीसरे दिन देवी गौरी का आवाहन से शुरू होता है। और पांचवें दिन विसर्जन के साथ समाप्त होता है। घर में गौरी के आने से धन, सुख समृद्धि आती है।
गौरी पूजा मुहूर्त,महाराष्ट्र में गौरी पूजा कैसे सेलिब्रेट करते हैं और व्रत कथा इस त्यौहार के पीछे की कहानी इसके बारे में विस्तृत जानकारी दी हैं ब्लॉग को अंत तक पढ़ने के लिए धन्यवाद। भारत के खास करके महाराष्ट्र की त्यौहार, घटना, डे, उत्सव के बारे में जानने के लिए हमें फॉलो करें। और आपके यहां गौरी गणपती कैसे मनाई जाती है उसके बारे में हमें जरूर बताइएगा। तुम्हारे यहां की कोई अलग कहानी देवी गौरी की मालूम हो तो उसके बारे में कमेंट करके हमें भी बताएं।
FAQS:
1. गौरी आवाहन 2025 कब है?
ज्येष्ठा गौरी का आवाहन रविवार 31 अगस्त 2025 को होगा।
2. गौरी गणपति पूजा के लिए कौन सी सामग्री चाहिए
ज्येष्ठा गौरी की दो मूर्तियां, गणपति की मूर्ति, कलश, कपूर, मोदक, दूर्वा, फूल, सिंदूर, धूप, सुपारी ,फल चाहिए इसके अलावा पूजा के लिए
चौकी, गंगाजल, पंचामृत और मिठाई भी आवश्यक है।
3. गणपति के साथ दो गौरी क्यों होती है?
पौराणिक मान्यता के अनुसार महाराष्ट्र में यह मानता है कि गौरी गणपति की बहने हैं और वह उनसे मिलने आती है। इन दोनों बहनों का नाम ज्येष्ठा गौरी(बड़ी बहन) और कनिष्ठ गोरी(छोटी बहन) है। उन्हें धन और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।और उनकी पूजा करने से घर में सुख समृद्धि आती है।